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बदलो से लड़कर खुद जलकर प्रकाश प्रज्जुलित नित्य करता हू ।
सुबह -सुबह आता हू नई -नई उम्मीदे आशाएँ लाता हू
प्रकाश दुनिया में फैलाता हू ॥
में हू प्रकाश पुंज जो कभी अस्त नहीं होता
यही प्रकाश काँच की भाती चुभे गर्मियों में
वही भावे जाड्नो में
सब समय -समय की बात हैं
में हू प्रकाश पुंज जो कभी अस्त नहीं होता
लाख छुपाएं बादल मुझे
बदलो से लड़कर खुद जलकर प्रकाश
प्रज्जुलित नित्य करता हू ।
दोपहर को लोगो की बुराइयो को समेटकर
तपन की आग में तपता ही जाता हू
दिन भर की तपन बुराइयो पीछे पहाड़ोनदियों में छोड़
शाम को होले से आसमान की
चादर ओढ़ कर घर को जाता हू
में हू प्रकाश पुंज जो कभी अस्त नहीं होता
बदलो से लड़कर खुद जलकर
प्रकाश प्रज्जुलित नित्य करता हू ।
फिर नई सुबह नई आशाओ के साथ आता हू
लेकिन कुछ समय के लिए पाप रूपी ग्रहण सुर्य में लग जाता है
लेकिन पाप कब तक पुण्य को छिपा सकता है
क्यों की प्रकाश पुंज हमेशा जगमगाता है
हमे सुर्य की तरह पुंज बनना है प्रकाश का
फैलाना है उजियाला देश में विकाश का
पाप रूपी ग्रहण तुम्हें भी अपना ग्रहण बनाऐगा
लेकिन तुम तो प्रकाश पुंज हो यह तेरा कुछ नही कर पाएगा
पाप रूपी ग्रहण तुजे देखता रह जाएगा
तू यु ही निरंतर आगे बढ़ ॥

Great work..👌
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