आओ माँ सरस्वती जी से सीखे जीवन जीने की कला :-
■शास्त्रो के अनुसार देवी सरस्वती जी विद्या की देवी है और उनका स्वरूप श्वेत वर्ण बताया गया है | माँ का वाहन भी सफेद हंस है | सफेद रंग शांति और पवित्रता का प्रतीक है| सफेद रंग शिक्षा देता है कि अच्छी विद्या और संस्कार के लिए आवश्यक है कि आपका मन शांत और पवित्र हो|
■ माँ के हाथ की माला सिखाती है , की हमे सदैव चिंतन में रहना चहिए |
■ माँ के वीणा हमे सीखती है, हमारे जीवन मे संगीत जैसी ललित कलाओं के लिए रुचि सदैव होनी चहिए ,संगीत एकरग्रता व मन शांत करने के लिए भी सहायक है |
■ माँ के चित्र में सूरज उगता हुआ दिखता है , यह सीखता है की ज्ञान की रोशनी से भाग्य का उदय सूरज जैसा होता है |
■ माँ के चित्र में माँ नदी किनारे एकांत में बैठी दिखाई देती है , यह सीखता है कि विद्यार्जन के लिए एकांत भी ज़रूरी है
■ माँ का वाहन हंस यही संदेश देता है कि मां सरस्वती की कृपा उसे ही प्राप्त होती है जो हंस के समान विवेक धारण करने वाला है। केवल हंस में ही वह विवेक होता है कि वह दूध और पानी को अलग-अलग कर सकता है। सभी जानते हैं कि हंस दूध ग्रहण और पानी छोड़ देता है। इसी तरह हमें भी बुरी सोच को छोड़कर अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए |
आइए यह सारी सीखे हम अपने-अपने जीवन मे उतार कर जीवन को सफल बनाए |
एक पिता के अपनी पुत्री की शादी में भाव
प्यारी लाडो,
क्या लिखूं तुझ पर ,
तू मेरा आसमान का वो तारा है
जो रोशन सबको करता है ,
तू हर ताले की चाबी है,
तू खुशियो का भंडार है,
तू माँ की परछाई है,
तू इत्र है गुलाल है,
तू घर की जान है,
तू बेटी नहीं ,बेटा है मेरा
मेरे कलेजे का टुकड़ा है,
तू कहने को तो मेरा अंश है,
पर जिस के बिन में शून्य ,तू वो रिक्त स्थान है
तू हर रिश्ते की डोर है,
तू मेरे जीवन की सबसे अनमोल इनायत है ,
क्या लिखूं अब ,बेटा
आज तुझे देखा लाल जोड़े में ,आँखे नम सी हो गयी
पता ही नही चला ,कब मेरी लाडो इतनी बड़ी हो गयी
वो नन्हे हाथ आज मेहँदी से सज गए
वो नन्हा सर आज दुपट्टा से सज गया
वो नन्हे पैर ,पायल से सज गए
(ऐसा पहली बार नही था आज , बचपन मे कई बार देखा है तुझे ऐशे, पर आज तेरे पापा नही देख पा रहे )
मेरी लाडो का दूल्हा ,आज सच मे उसे लेने आ गया,
मेरी बगिया का फूल आज कोई और का हो गया,
रीत ज़माने की लाडो, निभा रहा हूं,
पर तुझे खुद से दूर नही कर रहा हूं ,
तू तो मेरा बेटा है ,खाश आज सच हो जाए ,
और तू रुक जाए पर लड़ो ,लाडो है मेरी न ,
रीत है बस यह और कुछ नही खुद को समझा दिया है
कल से तेरा उपनाम बदल जाएगा पर पिता नही ,
तू मेरा गुरुर थी, है ,और रहेगी,
इस विश्वास से तुझे विदा कर रहा हूं
तेरे नए रिश्तो से जोड़ रहा हूं |
कहने को तो, सब अपने है ,
पर अपने मे अपना कौन ?
जीत में साथ निभाते सभी ,
हार में निभता कौन?
मुँह पर अच्छा बोलते सभी,
पीठ पीछे बोलता कौन ?.
षडयंत्र मुझे गिराने का रचते सभी ,
सुयोजना मुझे जिताने की करता कौन?
अपना अपना कहते सभी ,
अपनत्व निभाता कौन?
खुशी में साथ होते सभी,
दुख-दर्द में साथ होता कौन?
मैयत मे आंसू बहाते सभी,
जीवन मे आंसू पोछता कौन??
जाने के बाद अच्छाई करते सभी,
जीतेजी अच्छाई करता कौन?
तस्वीर को देख याद करते सभी,
सामने याद करता कौन?
बंधे सब नाजुक डोर से है,
इस डोर को सदा थामे रखता कौन?
बहूत ऊबड़ खाबड़ सा रहा है
यह सफर, दो हज़ार इक्कीस
उन्नीस , बीस सा रहा है ,यह इक्कीस
जो ढाल बन कर दुसरो को बचाते थे अक्सर ,
मैंने ऎसे हौसले को तन्हाई में टूटते देखा है
अपेक्षाओ के तले सपनो को दफन होते देखा है
ज़िम्मेदारियो में बचपन खोते देखा है
ज़िंदा ज़िस्म में घुटती रूहो को भी देखा है
मौत के फंदे छुपाए महफूज़ किवारो को भी देखा है
खुद की खुद से रुसवाई भी देखी है
तो अपनो की अपनो से लड़ाई भी देखी है
बनती - बिगड़ती ऐसी कहानियॉ देखी है
यह सफर की कुछ यादे है
जो खो गया , उसकी यादे साथ लेकर चले है
अब वाईस की और चले है हम
ज़िन्दगी तू ,कैसी है ?
एक तरफ मातम तो दूजी और शेहनाई है
बता न ज़िन्दगी तू ,ऐसी कैसी है ?
एक तरफ जन्म तो दूजी और शमशान है
बोल न, ज़िन्दगी क्या तेरी सच्चाई है
एक पल वीरान सी , दूजे पल आबाद सी है
ज़िन्दगी तू ऐसी कैसी है,?
कही सृजन तो ,कही नाश सी है
बता न ज़िन्दगी , क्या तेरा सार है ?
कभी मिलन तो ,कभी विरह सी है
कहो न ज़िन्दगी ,क्या तेरी वास्तविकता है?
रात का अंधकार सी है, या सुबह की किरण सी है
कुछ तो कहो ज़िन्दगी ,क्या तेरी रजा है?
कही हार तो कही जीत है
कहो ज़िन्दगी क्या तेरा आशय है ?
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