बहूत ऊबड़ खाबड़ सा रहा है
यह सफर, दो हज़ार इक्कीस
उन्नीस , बीस सा रहा है ,यह इक्कीस
जो ढाल बन कर दुसरो को बचाते थे अक्सर ,
मैंने ऎसे हौसले को तन्हाई में टूटते देखा है
अपेक्षाओ के तले सपनो को दफन होते देखा है
ज़िम्मेदारियो में बचपन खोते देखा है
ज़िंदा ज़िस्म में घुटती रूहो को भी देखा है
मौत के फंदे छुपाए महफूज़ किवारो को भी देखा है
खुद की खुद से रुसवाई भी देखी है
तो अपनो की अपनो से लड़ाई भी देखी है
बनती - बिगड़ती ऐसी कहानियॉ देखी है
यह सफर की कुछ यादे है
जो खो गया , उसकी यादे साथ लेकर चले है
अब वाईस की और चले है हम
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