ज़िन्दगी तू ,कैसी है ?
एक तरफ मातम तो दूजी और शेहनाई है
बता न ज़िन्दगी तू ,ऐसी कैसी है ?
एक तरफ जन्म तो दूजी और शमशान है
बोल न, ज़िन्दगी क्या तेरी सच्चाई है
एक पल वीरान सी , दूजे पल आबाद सी है
ज़िन्दगी तू ऐसी कैसी है,?
कही सृजन तो ,कही नाश सी है
बता न ज़िन्दगी , क्या तेरा सार है ?
कभी मिलन तो ,कभी विरह सी है
कहो न ज़िन्दगी ,क्या तेरी वास्तविकता है?
रात का अंधकार सी है, या सुबह की किरण सी है
कुछ तो कहो ज़िन्दगी ,क्या तेरी रजा है?
कही हार तो कही जीत है
कहो ज़िन्दगी क्या तेरा आशय है ?
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