Saturday, September 2, 2017

मिलन को तरसे है -बादल

sanyatikarya
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बादल आज फिर गरजे है
लगता किसी को मिलने को तरसे  है 
बन  सावन खिल उठे है 
लगता किसी की यादो  में झूम उठे है 
लगता आज फिर यादो के सहारे निखरे है 
बन बूंद -बूंद  जलाशय को चले है 
बन बून्द आज फिर बिखरे  है
आज फिर किसी की आँखों से अश्क बन चले है 
  बादल आज फिर गरजे है 
लगता किसी को मिलने को तरसे  है 
 लगता किसी को मिलने को तरसे  है 

sanyatikarya / Author & Editor

नमस्कार राम राम मेरे प्यारे श्रोताओं मेरा नाम सान्या है। मैं एक पेशे से एक डॉक्टर हूं। मै बीमारी का भी इलाज करती हूं दवाई से और कविताओं से भी विचलित मन का इलाज करती हूं। मेरी समस्त कविताएं संजीदा और प्रेरणादायक मुद्दे पर होती है जो इंसान को जीने के लिए प्रेरित करती है तो आप सभी कवि मित्रो और साहित्य प्रेमियों का मै सान्या आपका स्वागत करती हू|

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